IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-2 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | गोरखालैंड विमर्श एवं औचित्य

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IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-2 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | गोरखालैंड विमर्श एवं औचित्य- संघ लोक सेवा आयोग अक्टूबर के महीने में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का आयोजन करेगा। इस परीक्षा का उद्देश्य एक छात्र को परखने से है जो शासन, संविधान, राजनीति, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की समझ के आधार से संबंधित है। समस्या यह है कि चाहे कितनी ही अच्छी तैयारी कर ली जाए और भले ही कितना ज्ञान अर्जित कर लिया जाए फिर भी परीक्षा को लेकर हमेशा अनिश्चितता का भय रहता ही है। इस डर पर काबू पाने के लिए  IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-2 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स आपसे साझा कर रहे हैं, जिससे आप इन टॉपिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएं और आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

IAS GS Paper 2

आज का टॉपिक आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका से संदर्भित है।

 

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-2 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | गोरखालैंड विमर्श एवं औचित्य

प्रश्न : दार्जिलिंग में वर्तमान गोरखालैंड आंदोलन की जड़ें पुरानी हैं। इस मुद्दे को रस्शाकाशी के तहत तैयार किया जा रहा है-की जांच करें। इसके अतिरिक्त, क्या आपको लगता है कि अलग गोरखालैंड की मांग उचित है?

उत्तर:  गोरखालैंड का यह मुद्दा 1980 के दशक के मध्य में बेहद चर्चित हुआ था। पश्चिम बंगाल स्थित दार्जिलिंग के पहाड़ी  क्षेत्र में बसे नेपाली मूल के गोरखा, भोटिया और लेप्चा आदि समुदायों ने अपने लिये अलग राज्य ‘गोरखालैंड’ की मांग करते हुए गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के बैनर तले सुभास घिसिंग के नेतृत्व में आंदोलन शुरू किया था। कई बार यह आंदोलन उग्र हुआ और क्षेत्र में व्यापक हिंसा भी हुई। 1985 से 1988 के बीच चली लगातार हिंसा में हजारों लोग मारे गए। इसके बाद केंद्र से समझौता हुआ और वहाँ शान्ति स्थापित हुई। कुछ समय बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर बिमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की नींव रखी और गोरखालैंड की मांग फिर तेज़ हो गई। हालिया हिंसा का दौर पश्चिम बंगाल सरकार की उस घोषणा के बाद शुरु हुआ, जिसमें कहा गया है कि राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में बंगाली भाषा पढ़ाई जाए। इस फैसले के बाद एक बार फिर विरोध की चिंगारी सुलग गई। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का आरोप है कि ममता बनर्जी सरकार उन पर बंगाली भाषा थोप रही है।

गोरखा आन्दोलन का इतिहास  

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। इस मुद्दे पर बीते लगभग तीन दशकों से कई बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं। ताजा आंदोलन भी इसी की कड़ी है। दार्जिलिंग इलाका किसी दौर में राजशाही डिवीजन (अब बांग्लादेश) में शामिल था। उसके बाद वर्ष 1912 में यह भागलपुर का हिस्सा बना। देश की आजादी के बाद वर्ष 1947 में इसका पश्चिम बंगाल में विलय हो गया। अखिल भारतीय गोरखा लीग ने वर्ष 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक ज्ञापन सौंप कर बंगाल से अलग होने की मांग उठायी थी।

उसके बाद वर्ष 1955 में जिला मजदूर संघ के अध्यक्ष दौलत दास बोखिम ने राज्य पुनर्गठन समिति को एक ज्ञापन सौंप कर दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार को मिला कर एक अलग राज्य के गठन की मांग उठायी। अस्सी के दशक के शुरूआती दौर में वह आंदोलन दम तोड़ गया। उसके बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बैनर तले सुभाष घीसिंग ने पहाड़ियों में अलग राज्य की मांग में हिंसक आंदोलन शुरू किया। वर्ष 1985 से 1988 के दौरान यह पहाड़ियां लगातार हिंसा की चपेट में रहीं। इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम 13 सौ लोग मारे गए थे। उसके बाद से अलग राज्य की चिंगारी अक्सर भड़कती रहती है।

राज्य की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सुभाष घीसिंग के साथ एक समझौते के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया था. घीसिंग वर्ष 2008 तक इसके अध्यक्ष रहे। लेकिन वर्ष 2007 से ही पहाड़ियों में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बैनर तले एक नई क्षेत्रीय ताकत का उदय होने लगा था। साल भर बाद विमल गुरुंग की अगुवाई में मोर्चा ने नए सिरे से अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन शुरू कर दिया।

गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) को समझौते के मुताबिक विभाग नहीं सौंपे गए। पांच साल बीतने के बावजूद न तो पूरा अधिकार मिला और न ही पैसा। राज्य सरकार ने हमें खुल कर काम ही नहीं करने दिया। ऊपर से जबरन बांग्ला भाषा थोप दी।” यह अब अस्मिता का सवाल है। प्रबल उप-राष्ट्रवाद की भावनाओं में जकड़े गोरखा समुदाय को यह भी शिकायत है कि भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों में भिन्नता के बावजूद उन्हें नेपाली कहा जाता है और नेपाली से पड़ोसी देश का नागरिक होने का संदेह होता है।

हो सकता है कि स्कूलों में ममता बनर्जी का बंगाली को अनिवार्य बनाने का मुद्दा राजनीति से प्रेरित रहा हो, लेकिन यह भी सत्य है कि बंगाली समुदाय अपनी भाषाई पहचान को लेकर अतिरिक्त सचेत रहा है। इसका प्रमाण हैं आज़ादी से पहले और बाद में बंगाली भाषा के समर्थन में चले आंदोलन, जिनमें कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। फिलहाल दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्र में जो हिंसक आन्दोलन चल रहा है, उसके मूल में यही भाषा का मुद्दा है।

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मुद्दे को लम्बा चलने का कारण

माना यह जा रहा है कि गोरखालैंड की मांग करने वाला नेतृत्व लंबे समय से किसी मुद्दे की तलाश में था और ममता बनर्जी ने यह उसे प्लेट में रखकर पेश कर दिया। बिमल गुरुंग बार-बार एक ही बात कह रहे हैं कि जिस क्षेत्र के 95% लोग नेपाली बोलने वाले हैं, वहाँ बांग्ला भाषा लागू करने का कोई औचित्य नहीं है। इसलिये यह मुद्दा भाषाई भी बन गया है। कांग्रेस और माकपा जैसे दल राज्य का विभाजन करने के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय भावनाओं का उभार देख चुपचाप बैठे हैं। एक मत यह भी है कि कोलकाता के बिना दार्जिलिंग व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इस पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले गोरखाओं का यह मानना है कि बंगाली उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं करते, जिसके वे हकदार हैं।  1975 में सिक्किम के भारत में विलय के बाद जो दर्जा गंगटोक को मिला, उसने भी दार्जिलिंग के जले पर नमक छिड़कने का काम किया। इसके अलावा इस क्षेत्र में रहने वालों की एक प्रमुख शिकायत यह है कि उनके यहाँ 80-90 चाय बागान हैं और उनसे मिलने वाले राजस्व की तुलना में दार्जिलिंग को उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता। इसके अलावा यह मानने वालों की कमी नहीं है कि दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्र में देश के चुनिंदा रेजिडेंशियल स्कूल हैं तथा पर्यटन की दृष्टि से भी यह बेहद समृद्ध है। ऐसे में इसकी अलग पहचान होना ज़रूरी है। कुछ विश्लेषकों का यह मत है कि भाजपा के राज्य में बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये ममता बनर्जी ने भाषा का संवेदनशील मुद्दा उठाया, जिसकी विपरीत प्रतिक्रया दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्र में देखने को मिली। इसके विपरीत ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है कि देश के अन्य क्षेत्रों में चल रहे किसान आन्दोलनों की आँच कम करने के लिये भाजपा ने इस मुद्दे को हवा दी। माना जा रहा है कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा में बिमल गुरुंग के नेतृत्व को चुनौती मिल रही है तथा  गोरखालैंड एंड आदिवासी टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के चुनाव अगले माह होना प्रस्तावित है। गोरखालैंड एक ऐसा मुद्दा है, जो बिखरे हुए सभी गुटों को एक छतरी के नीचे ले आता है। ऐसे में बिमल गुरुंग किसी मुद्दे की तलाश में थे, जो उन्हें बैठे-बिठाए मिल गया। वर्तमान परिस्थितियों में ‘गोरखालैंड’ के नाम पर विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में एका लाना कोई कठिन काम नहीं है; और ऐसा ही देखने में भी आ रहा है। इसके अलावा गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि मैदानी समझी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस ने पहाड़ी क्षेत्रों में हाल ही में हुए स्थानीय चुनावों में कई स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए अपने वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि की तथा मिरिक नगरपालिका में जीत भी दर्ज की। पहाड़ी क्षेत्र में चल रही हिंसा का संबंध इसके साथ भी जोड़ा जा रहा है। हाल ही में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से अलग हुए एक धड़े का यह मानना है कि यह सब इस क्षेत्र में बसे लोगों की हताशा का परिणाम है, जो एक पृथक राज्य चाहते हैं और इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।

क्या गोरखालैंड की मांग उचित है?

गोरखालैंड की मांग करने वालों को यह स्मरण रखना होगा कि मात्र 20 लाख लोगों के लिये भाषाई, जातीय या सांस्कृतिक आधार पर पृथक गोरखालैंड बनाना संभव नहीं है। अतः उन्हें मध्यम मार्ग अपनाना होगा और सम्मान, सत्ता व्यवस्था में ही अधिक भागीदारी हासिल करने के लिये प्रयास करने होंगे। जिन चाय बागानों से आय का तर्क दिया जा रहा है उनकी हालत खुद खस्ता है और उन्हें कड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ रहा है। कई चाय बागानों पर ताले पड़ चुके हैं। राजस्व का मुख्य स्रोत पर्यटन है, जो इस आंदोलन से प्रभावित हो रहा है। स्थानीय शासन को कुछ सीमा तक स्वायत्तता देते हुए क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये इन चाय बागानों को पुनः लाभदायक बनाने और पर्यटन का विस्तार करने के लिये अवसंरचनात्मक उपाय करने  चाहिये। अस्पताल, कार्यालय, होटल और स्कूलों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं, इनके माध्यम से रोज़गार के अवसर पैदा किये जा सकते हैं| युवाओं को रोज़गार मिलेगा तो वे हिंसा से विमुख होंगे। इस मुद्दे को हल करने के लिये देश के संविधान के तहत मध्यमार्गी उपाय करने होंगे, जिसमें केंद्र, राज्य और स्थानीय प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। अलग गोरखालैंड की माँग को किसी भी राष्ट्रीय दल का समर्थन प्राप्त नहीं है तथा एक निश्चित सीमा के बाद उप-राष्ट्रीयता की मांग पर विचार करना संभव नहीं रहता। इसलिये अलग राज्य की मांग को त्याग कर क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना होगा। यह एक राजनीतिक मुद्दा है और इसका हल भी राजनीतिक ही होगा। भौगोलिक दृष्टि से यह इलाका पश्चिम बंगाल की मुख्यधारा से बहुत दूर है और भाषा-संस्कृति का बंगाली तत्त्व यहां काफी कमज़ोर है। ऐसे में इस पहाड़ी इलाके की समस्या को हल करने के लिये एक अलग मॉडल की आवश्यकता है।

अलग गोरखालैंड का मुद्दा न तो भाषाई है और न ही क्षेत्र के विकास से इसका कोई लेना-देना है। यह विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा है, जिसमें ममता बनर्जी का पलड़ा भारी है। क्षेत्र की पर्यटन पर आधारित अर्थव्यवस्था अधिक समय तक ऐसा अराजक माहौल नहीं झेल सकती और स्थानीय स्तर पर ही इसका विरोध शुरू हो जाएगा। बिमल गुरुंग क्षेत्र में अपनी पकड़ पुनः कायम करना चाहते हैं और उन्हें चुनौती अपने दल के भीतर से तो मिल ही रही है, ममता बनर्जी का भी सामना उन्हें करना पड़ रहा है। यदि गोरखा दलों को राज्य सरकार से कोई शिकायत है तो उसे उचित मंच पर उठाना सही तरीका है, न कि पूरे क्षेत्र को बंधक बनाकर उसे हिंसा की आग में झोंक देना।

OnlineTyari टीम द्वारा दिए जा रहे उत्तर UPSC की सिविल सेवा परीक्षा (IAS परीक्षा) के मानक उत्तर न होकर सिर्फ एक प्रारूप हैं। जिससे अभ्यर्थी उत्तर लेखन की रणनीति से अवगत हो सकेगा। वह उत्तर में निर्धारित समयसीमा में कलेवर को समेटने और समय प्रबंधन की रणनीति से परिचय पा सकेगा। जिससे वह सम्पूर्ण परीक्षा को समयसीमा में हल करने में समर्थ होगा।

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