IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-3 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | नदी जोड़ो परियोजना

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IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-3 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | नदी जोड़ो परियोजना – IAS की मुख्य परीक्षा के GS पेपर-3 के पाठ्यक्रम से स्पष्ट है कि इस प्रश्न पत्र के अन्तर्गत आर्थिक विकास से संबंधित मुद्दे, प्रौद्योगिकी एवं जैवविविधता, आर्थिक विकास, वातावरण, पर्यावरण एवं आपदा प्रबंध से संबंधी मुद्दे, सुरक्षा से संबंधित मुद्दे आते हैं। यह प्रश्नपत्र काफी जटिल एवं सामायिक विषयों पर आधारित होता है। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वें दिन प्रतिदिन के सामयिक विषयों पर अपनी समझ बनाये।

इस पेपर के लिए उम्मीदवार के विश्लेषणात्मक और तथ्यात्मक ज्ञान की आवश्यकता होती है और इस प्रकार इस परीक्षा को पास करना एक चुनौती बन जाती है। अभ्यर्थियों को चाहिये कि वे समसामयिक मुद्दों पर विभिन्न सूचनाओं का संग्रह कर, मुख्य परीक्षा के प्रश्नों के प्रारूप व प्रकृति को समझते हुए स्वयं प्रश्न तैयार करके उत्तर लिखने का प्रयत्न करें।

 

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | टॉपिक 8 

परीक्षा के डर पर काबू पाने के लिए  IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-3 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स आपसे साझा कर रहे हैं, जिससे आप इन टॉपिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएं और आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें। आज का टॉपिक ‘नदी जोड़ो परियोजना’ के विमर्श से संदर्भित है।

प्रश्न : ‘नदी जोड़ो परियोजना’ से सम्बंधित पहलुओं का उल्लेख करते हुए इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।

दुनिया में जितना पानी उपलब्ध है उसका सिर्फ चार फीसद ही भारत के पास है। इतने में ही भारत पर अपनी आबादी जो दुनिया की आबादी का 18 फीसद है, की पानी सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने का भार है, लेकिन यह स्मरण रहे कि प्रति वर्ष वर्षा जल का करोड़ों क्यूबिक पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। इसके अतिरिक्त बाढ़ और सूखे की समस्या से मुक्ति पाने के लिए भी नदी जोड़ों परियोजना पर विमर्श चल रहा है। विदित है कि प्रत्येक वर्ष बाढ़ के कारण भारत के कई जिले प्रभावित होते हैं, कभी बिहार तो कभी बंगाल, कभी असम तो कभी राजस्थान जैसे राज्यों को भीषण बाढ़ से दो-चार होना पड़ता है। यही कारण है कि कई दशकों से नदी जोड़ो परियोजना को अमल में लाने की बात होती रही है और अभी केंद्र सरकार ने 87 अरब डॉलर की एक परियोजना की औपचारिक शुरुआत केन-बेतवा के लिंकिंग योजना से करने जा रही है। एक तरफ जहाँ नदी जोड़ो परियोजना को बाढ़ और सूखे के हालातों का सामना करने के लिये उपयुक्त मानते हुए इसे  संभावनाओं का द्वार खोलने वाला माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके विपक्ष काफी विवाद भी सामने आ रहे हैं।

अगर हम नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना को जानने की कोशिश करें तो विदित होगा कि सर्प्रथम यह विचार  वर्ष 1919 में मद्रास प्रेसिडेंसी के मुख्य इंजीनियर सर आर्थर कॉटोन ने रखा था। आज़ाद भारत में सबसे पहले वर्ष 1960 में तत्कालीन केंद्रीय ऊर्जा और सिंचाई राज्यमंत्री के. एल. राव ने गंगा और कावेरी नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा था, जिसके बाद नदी जोड़ो अभियान को बल मिला। वर्ष 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘नेशनल वाटर डेवेलपमेंट एजेंसी’ का गठन किया था, वहीं वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को वर्ष 2003 तक इस योजना की रूपरेखा तैयार करने और वर्ष 2016 तक इस योजना को असली जामा पहनाने का आदेश दिया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना पर समयबद्ध तरीके से अमल करे, ताकि विलंब के कारण इसकी लागत में और अधिक बढ़ोतरी न हो। वर्ष 2016 में सरकार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना पर गम्भीरता से अमल करना शुरू किया।

नवीनतम घटनाक्रम 

  • महत्वाकांक्षी और वृहद परियोजना के तहत गंगा समेत 60 से ज्यादा नदियों को जोड़ने की योजना है। केंद्र सरकार जल्द ही 87 अरब डॉलर की महत्त्वाकांक्षी परियोजना को प्रारंभ करने जा रही है, इस योजना से नेपाल, बांग्लादेश की ओर से आने वाली बाढ़़ से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा। इससे ना केवल मानसूनी बारिश पर किसानों की निर्भरता कम होगी बल्कि लाखों हेक्टेयर में फसलों को समय पर पानी मिल सकेगा।
  • उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के धार्मिक पर्यटन नगर उज्जैन में बहने वाली शिप्रा नदी को नर्मदा नदी से जोड़ा गया है और इसका लाभ यह हुआ है कि पर्याप्त बारिश न होने के बावज़ूद भी इस क्षेत्र में पेयजल का प्रबंध किया जा सकता है। अब केन व बेतवा नदी जोड़ो परियोजना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

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नदी जोड़ो योजना के लाभ?

नदियों को जोड़ने के तहत अगर ज्यादा पानी वाली नदियों को कम पानी वाली नदियों से जोड़ा जाता है तो न सिर्फ बाढ़ और सूखे का स्थायी समाधान होगा बल्कि बिजली उत्पादन में भी भारी बढ़ोतरी होगी। नौ करोड़ एकड़ में सिंचाई की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। देश में 69 हजार मिलियन घनफुट पानी उपलब्ध है। इसमें से हम मात्र तेरह प्रतिशत जल का ही उपयोग कर पाते हैं। बाकी 87% पानी समुद्र में चला जाता है। एक हजार मिलियन घन फुट पानी का अगर सिंचाई के लिए उपयोग किया जाए तो उससे हर साल  करोड़ों की फसल पैदा होगी। नदी जोड़ों से हम 25 करोड़ हैक्टेयर में खाद्यान्न का जो उत्पादन कर पाएंगे उसका मूल्य 20 लाख करोड़ प्रतिवर्ष होगा। साथ ही इससे स्वच्छ पानी की समस्या से निज़ात मिलेगी और पानी का लेवल बढ़ाने में भी मदद मिलेगी साथ नहरों के विकास से एकतरफ नौवहन का विकास होगा साथ ही सिंचाई रकबे में खुद-बखुद वृद्धि होगी जिससे कृषि के उत्पादन में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। लाखों कृषक परिवारों के जीवन में इससे सुधार होगा और उनको बदहाली से निजात मिलेगी। बड़े पैमाने पर वनीकरण को प्रोत्साहन मिलेगा जिससे पर्यावरण स्वच्छता की तरफ भी कदम बढ़ेंगे।
साथ ही ग्रामीण जगत के भूमिहीन कृषि मजदूरों के लिये रोज़गार के तमाम अवसर पैदा होंगे, जो आर्थिक विकास को एक नई दिशा प्रदान करेगी।

परियोजना से संबंधित समस्याएँ

नदी जोड़ो परियोजना के संबंध में सरकार ने प्रारंभिक मंज़ूरी सहित कई मोर्चों पर महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। नदी जोड़ो परियोजना जो दशकों से शुरू होने की बाट जोह रही है, के मामले में विशेषज्ञों की राय हमेशा से विभाजित रही है।

इस परियोजना के तहत 3,000 से अधिक जल भंडारण संरचनाओं तथा 15,000 किलोमीटर से अधिक लंबी नहरों के नेटवर्क के निर्माण में करीब 5.6 ट्रिलियन रूपए का खर्च आएगा। ये आँकड़े बताते हैं कि नदी-जोड़ो परियोजना अभियांत्रिकी के इतिहास में अब तक का सबसे साहसी कारनामा साबित हो सकता है। ज़ाहिर है कि जब योजना इतनी बड़ी है तो चुनौतियाँ भी बड़ी होंगी।

  • नदी जोड़ो परियोजना के आलोचकों का कहना है कि यह परियोजना विसंगतियुक्त जल विज्ञान और जल प्रबंधन की पुरानी समझ पर आधारित है। जिसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। आलोचकों के इस विचार के निहितार्थ को समझने के लिये हमें पहले यह जानना होगा कि जल प्रबंधन का वह कौन सा विचार है जिस पर यह परियोजना आधारित है।
  • दरअसल, नदी जोड़ो परियोजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों को नहरों के एक नेटवर्क से जोड़ा जाए, ताकि जल अधिशेष वाली नदियों के जल को इन नहरों के नेटवर्क से उन नदियों तक पहुँचा दिया जाए जिनमें जल का स्तर निम्न है।
  • मुंबई और चेन्नई में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के शोधकर्त्ताओं के एक नए अध्ययन ने एक अलग ही तस्वीर पेश की है। वर्ष 1901 से 2004 तक के बीच के 103 वर्षों के अध्ययन से मौसम संबंधी डेटा का विश्लेषण करने के बाद शोधकर्त्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पहले की तुलना में अब नदियों के जल अधिशेष में 10% से अधिक की कमी आई है।
  • जहाँ तक पर्यावरणीय चिंताओं का सवाल है तो यह माना जाना कि नदी जलापूर्ति का एक माध्यम मात्र है चिंतित करने वाला है। दरअसल, नदी एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है और इसमें लाया जाने वाला बदलाव सभी वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित करेगा। साथ ही नदियों द्वारा निर्मित उत्तर भारत का विशाल मैदान उपजाऊ बना रहे, इसके लिये नदियों से अत्यधिक छेड़छाड़ को उचित नहीं कहा जा सकता है।
  • यही कारण है कि कुछ हद तक पर्यावरणीय मंज़ूरी प्राप्त करने के बावज़ूद केन-बेतवा परियोजना, पन्ना टाइगर रिज़र्व में संभावित अतिक्रमण को लेकर अटकी पड़ी है।

राजनीतिक चुनौतियाँ

  • कौन सा पानी किसका है? नदी-समुद्र का पानी किसका है? सरकार का नदियों एवं तालाबों के जल पर मालिकाना अधिकार है या सिर्फ़ रख-रखाव की ज़िम्मेदारी? वर्तमान में ये सभी यक्ष-प्रश्न बने हुए हैं।
  • राजनीतिक कारणों से राज्य सरकारें अपने-अपने हितों के लिये अड़ने लगेंगी। कितने राज्यों के बीच पानी का झगड़ा अभी तक अनसुलझा ही है। वे दूसरे राज्यों को पानी देने को तैयार नहीं होते। सतलुज-यमुना और कावेरी जैसे जल विवाद तो शीर्ष न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बावज़ूद सुलझने का नाम नहीं ले रहे हैं।
  • इन परिस्थितियों में इतने बड़े स्तर पर जल हस्तानान्तरण कई विवादों को जन्म दे सकता है। इनमें से कई विवाद तो 50 वर्षों से भी अधिक समय से जारी हैं। यह देखते हुए कि नदियों में पानी की लगातार कमी होती जा रही है शायद ही कोई राज्य अपने हिस्से का पानी किसी अन्य राज्य को देने को तैयार होगा। यदि यही परिस्थितियाँ बनी रही तो नदियों के जल को लेकर राजनैतिक विवाद नदी जोड़ो परियोजना की सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकती है।

निष्कर्ष

नदी जोड़ो परियोजना एक बड़ी चुनौती तो है ही, लेकिन साथ में यह जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले जल संबंधित मुद्दों को हल करने का एक अवसर भी है। अतः इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है और यह गंभीरता उस हद तक जायज़ कही जा सकती है, जहाँ नुकसान कम लेकिन फायदे ज़्यादा हों। इसे अमल में लाने का समुचित प्रयास होना चाहिये, लेकिन साथ में इसकी भी नितांत आवश्यकता है कि पानी की एक सीमित और खत्म हो रहे संसाधन के रूप में पहचान की जाए। सरकार को चाहिये कि राज्यों से विचार-विमर्श के बाद तुरंत एक ऐसी राष्ट्रीय जल नीति का निर्माण करे, जो भारत में भूजल के अत्यधिक दोहन, जल के बँटवारे से संबंधित विवादों और जल को लेकर पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताओं का समाधान प्रस्तुत कर सके। इन सुधारों पर कार्य करते हुए नदी जोड़ो परियोजना की तरफ कदम बढ़ाया जाना चाहिये।

 

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